धन का नाश || चाणक्य नीति chanakya niti || भाग 94

धन का नाश  || चाणक्य नीति chanakya niti || भाग 94

chanakya niti for success in life in hindi

466 : - दूसरे का धन किंचिद् भी नहीं चुराना चाहिए।
466 : - doosare ka dhan kinchid bhee nahin churaana chaahie.
467 : - दूसरों के धन का अपहरण करने से स्वयं अपने ही धन का नाश हो जाता है।
467 : - doosaron ke dhan ka apaharan karane se svayan apane hee dhan ka naash ho jaata hai.
468 : - चोर कर्म से बढ़कर कष्टदायक मृत्यु पाश भी नहीं है।
468 : - chor karm se badhakar kashtadaayak mrtyu paash bhee nahin hai.
469 : - जीवन के लिए सत्तू (जौ का भुना हुआ आटा) भी काफी होता है।
469 : - jeevan ke lie sattoo (jau ka bhuna hua aata) bhee kaaphee hota hai.
470 : - हर पल अपने प्रभुत्व को बनाए रखना ही कर्त्यव है।
470 : - har pal apane prabhutv ko banae rakhana hee kartyav hai.

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