चाणक्य के अनमोल विचार – भाग 138

चाणक्य के अनमोल विचार – भाग 138
686 : - आशा के साथ धैर्य नहीं होता।
686 : - aasha ke saath dhairy nahin hota.
687 : - निर्धन होकर जीने से तो मर जाना अच्छा है।
687 : - nirdhan hokar jeene se to mar jaana achchha hai.
688 : - आशा लज्जा को दूर कर देती है अर्थात मनुष्य को निर्लज्ज बना देती है।
688 : - aasha lajja ko door kar detee hai arthaat manushy ko nirlajj bana detee hai.
689 : - आत्मस्तुति अर्थात अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से नहीं करनी चाहिए।
689 : - aatmastuti arthaat apanee prashansa apane hee mukh se nahin karanee chaahie.
690 : - दिन में स्वप्न नहीं देखने चाहिए।
690 : - din mein svapn nahin dekhane chaahie.

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